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ठेकेदार को दिए पैसे का रिकॉर्ड

मज़दूर का हिसाब दिनों से चलता है, ठेकेदार का तय रकम से। पूरे मकान में सबसे बड़ी रकमें इसी खाते से निकलती हैं, और सबसे लंबी बहस भी यहीं होती है — क्योंकि पैसा थोड़ा-थोड़ा करके आठ महीने में जाता है और तय रकम एक बार ज़बानी तय होती है।

तय रकम पहले लिखिए, काम शुरू होने से पहले

हर ठेकेदार के नाम के आगे तीन बातें शुरू में ही लिख लीजिए:

तीसरी बात सबसे ज़रूरी है और सबसे ज़्यादा छूटती है।

"आठ सौ रुपये फुट" का कोई मतलब नहीं है जब तक यह न लिखा हो कि उसमें सामग्री है या नहीं। सिर्फ़ मज़दूरी का सिविल भाव आम तौर पर कुछ सौ रुपये फुट होता है; सामग्री सहित वही काम दो हज़ार तक जाता है। यानी दोनों में कई गुना का फ़र्क़ है। एक ही संख्या लिख छोड़ने पर पूरे मकान का अंदाज़ा ग़लत बैठता है — और यह ग़लती लाखों की होती है।

हर भुगतान तारीख़ के साथ दर्ज कीजिए

ठेकेदार को पैसा एक बार में नहीं जाता। छत के समय कुछ, चिनाई के बाद कुछ, बीच में त्योहार पर कुछ अग्रिम। हर बार यह लिखिए:

माध्यम लिखना छोटी बात लगती है पर काम आती है। यूपीआई और चेक के अपने निशान बैंक में रहते हैं; जिन भुगतानों पर बाद में सवाल उठता है वे लगभग हमेशा नक़द वाले होते हैं। जब आपको पता हो कि इनमें से कौन-से नक़द थे, तो ठीक उन्हीं पर पर्ची या दस्तख़त रखने की समझ बनती है।

ठेकेदारकामतय रकमअब तक दियाबाक़ी
रामानंद सिविल ठेकेदारसिविल (सिर्फ़ मज़दूरी)4,50,0003,20,0001,30,000
भोला सिंह प्लंबरप्लंबिंग (सामग्री सहित)1,10,00085,00025,000
दीपू इलेक्ट्रिकलबिजली का काम95,00095,0000

यह तीन-कॉलम वाली तस्वीर ही असली काम की चीज़ है। "कुल कितना खर्च हुआ" जानना आसान है; "किस-किस का कितना बाक़ी है" जानना मुश्किल है, और भुगतान के दिन यही चाहिए होता है।

उधार लिया सामान भी इसी खाते में जाता है

सप्लायर से सामान उधार आना आम है — ईंट आ गई, पैसा बाद में। लोग अक्सर उस दिन कुछ लिखते ही नहीं, क्योंकि पैसा तो गया ही नहीं।

यह उल्टा है। जिस दिन सामान आया उसी दिन पूरी रकम लिखिए और दिया गया शून्य रखिए। तभी वह रकम उस पार्टी के बाक़ी में जुड़ेगी। न लिखने पर लेनदारी कहीं दर्ज ही नहीं होती, और महीने बाद जब सप्लायर पैसे माँगता है तो आपके पास मिलाने को कुछ नहीं होता।

ठेकेदार और मज़दूर का खाता मत मिलाइए

ये दो अलग तरह के हिसाब हैं और इन्हें एक जगह रखने से दोनों बेकार हो जाते हैं:

कुछ ठेकेदार दोनों तरह से काम करते हैं — मुख्य काम ठेके पर, और बीच में दो आदमी दिहाड़ी पर भेज देते हैं। ऐसी हालत में भी दोनों अलग लिखिए, वरना काम ख़त्म होने पर यह तय नहीं हो पाता कि तय रकम पूरी हुई या नहीं।

काम पूरा होने पर हिसाब बंद कीजिए

आख़िरी भुगतान से पहले एक बार साथ बैठकर पूरा खाता मिला लीजिए — तय रकम, बीच में जो काम बढ़ा उसकी अलग रकम, कुल दिया, और बचा हुआ। यह पंद्रह मिनट का काम है और महीनों की कड़वाहट बचाता है।

बढ़े हुए काम को शुरू वाली तय रकम में चुपचाप मत जोड़िए। उसे अलग लिखिए — "बाउंड्री वॉल, अलग से ₹1 लाख" — ताकि छह महीने बाद यह साफ़ रहे कि रकम क्यों बढ़ी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ठेकेदार पक्का बिल नहीं देता, तो क्या रखूँ?

ज़्यादातर नहीं देते। जो आपके हाथ में है वह है — तारीख़वार भुगतान की अपनी सूची, और बड़ी रकमों पर एक सादा पर्ची जिस पर उसने रकम और तारीख़ लिखकर दस्तख़त कर दिए हों। यूपीआई से दिया गया पैसा अपने आप में रिकॉर्ड है, और इसी वजह से बड़ी रकमें यूपीआई या चेक से देना बेहतर रहता है।

अग्रिम को अलग गिनूँ या दिए हुए में?

दिए हुए में। अग्रिम कोई अलग श्रेणी नहीं है — वह भी तय रकम में से ही घटता है। अलग गिनने पर लोग उसे बाद में जोड़ना भूल जाते हैं और दोबारा दे बैठते हैं।

अगर ठेकेदार को तय से ज़्यादा दे दिया तो?

होता है, ख़ासकर जब भुगतान कई बार में गया हो। इसीलिए बाक़ी वाला ख़ाना हर भुगतान के बाद देखना चाहिए, महीने के आख़िर में नहीं। ज़्यादा दिया हुआ पैसा वापस लेना, न दिए हुए को माँगने से कहीं मुश्किल है।

एक ही आदमी सामान भी देता है और काम भी करता है, तो?

खाता एक ही रखिए, पर प्रविष्टियाँ अलग — सामान वाली अलग, मज़दूरी वाली अलग। बाक़ी दोनों का मिलाकर एक ही निकलेगा, जो सही है, पर आगे यह देख पाएँगे कि उसमें सामान का हिस्सा कितना था।

Lagat में पार्टी का खाता

हर ठेकेदार और सप्लायर का अपना खाता — तय रकम, अब तक दिया, और चलता हुआ बाक़ी। सिविल भाव के साथ यह भी दर्ज होता है कि उसमें सिर्फ़ मज़दूरी है या सामग्री भी, इसलिए बजट का अंदाज़ा असल के पास रहता है। उधार लिया सामान एक निशान लगाते ही पूरी रकम बाक़ी में डाल देता है। एक व्यक्ति के लिए हमेशा मुफ़्त।